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संस्मरण: एक गाँव था कुरह पर्सिया…..जिसे सरयू की कटान ने निगल लिया

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बचपन में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाले धार्मिक नहान के कार्यक्रम में अपने दादा जी स्वर्गीय रामकरण पांडेय के साथ उनके ननिहाल कुरह पर्सिया गया था। मेरे दादा जी, जो पेशे से चिकित्सक थे, उनका धार्मिक आस्थाओ में विश्वास ज्यादा हुआ करता था। मेरी माता जी जो उत्तर प्रदेश मेडिकल फैकल्टी के अधीन कार्यरत थी जिनका कार्यक्षेत्र बारा दीक्षित स्वास्थ्य केंद्र के आधीन था, उनके साथ कुरह पर्सिया एक बार जाने का मौका मिला था।

दादा जी के साथ उन गावों में सरयू स्नान के दौरान पवित्र सरयू से 500 मीटर दक्षिण एक पीपल के पेड़ के नीचे अपने कपडे बदल कर सरयू स्नान का अप्रतिम आनंद मिला। स्नान ध्यान के बाद दादा जी के ननिहाल में स्वादिष्ट भोजन उपरांत हम लोग बारा दीक्षित वापस आ गये।

कुछ वर्षों उपरांत पता चला की सरयू नदी के कटान में वो पीपल का वृक्ष जिसके छाया तले हमने स्नानोपरांत कपडे बदले थे, नदी के धारा में विलीन हो गया। सुन कर बड़ा दुःख हुआ। समयचक्र चलता रहा। सरयू का पानी धारा के साथ समुन्द्र में मिलता रहा। हद तो तब हो गयी जब एक दिन सुनने को मिला की पूरा कुरह पर्सिया गाँव ही सरयू के आगोस में समा गया और आज बच गयी है सिर्फ उसकी यादें।

आज सरयू का कटान चरम पर है, प्रशासन मौन है। पूरा गांव बसपा सरकार के ज़माने से क़टते हुए, समाजवादी सरकार के ज़माने में अपना अस्तित्व खो दिया। सरकारें आती-जाती रहीं। उसी प्रकार एक के बाद एक कई घर नदी के आगोश में जाते रहे। और अब मै और मेरे जैसे बहुत सारे पत्रकार मित्र उन गावों की कहानियां लिख रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि सरयू का तांडव रुक गया है। वो अब भी अनवरत जारी है। कपरवार गांव निवासी मानवेन्द्र त्रिपाठी ने बताया की अब कुवाइच टोला का अस्तित्व भी खतरे में है। समाजसेवी बृजेश मिश्रा ने बताया की अवैध खनन भी कही न कही इसके लिए जिम्मेवार है। कपरवार से लेके तकिया धरहरा तक बहुत सारे गाँव आज नदी के कटान के जद में है।

मोहन सेतु निर्माण संघर्ष समिति के अध्यक्ष और पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष निशिकांत दीक्षित के अनुसार यदि कपरवार से बरहज बाजार को देखा जाए तो ऐसा लगता है की नदी ने एक वक्र बनाया है। जिसके कारण भविष्य में कटइलवा और बेलड़ार के साथ गौरा का भी अस्तित्व खतरे में आ सकता है।

बचपन की यादें और वो भी जब आपके साथ आपका कोई अति प्रिय हो, वो विस्मित नहीं हो सकती। दादा जी के साथ कुरह पर्सिया का वो धार्मिक स्नान और पीपल का पेड़ आज भी स्मृतियों में जिन्दा है। सोचता हूँ जिनका बचपन इन गावों के गलियों में बीता बिता होगा, उनको कितना दुःख होता होगा!

(लेखक अमित कुमार पांडेय एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा में प्रोफेसर हैं)

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