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देवरिया के इस शिक्षक ने सत्यनारायण व्रत कथा को काव्यात्मक रूप में पिरोया

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राकेश मिश्रा
गोरखपुर:
समूचे देश में कोरोना महामारी से बचने समय लॉक डाउन चल रहा है। लोग ऐसे में कई तरह के कार्य कर अपने आप को व्यस्त रखने का प्रयास कर रहे हैं। कोई बागवानी कर रहा है तो कोई किचन में भी हाथ आजमा रहा है। तो वहीँ कोई सोशल मीडिया पर तमाम चैलेंज देकर इस समय का सदुपयोग करता दिख रहा है। ऐसे में देवरिया के मूल निवासी और वर्तमान में राजस्थान में अध्यापन का कार्य कर रहे मृत्युंजय तिवारी ने इस समय को व्यर्थ ना करते हुए इसका सदुपयोग करने की ठानी। इस लॉक डाउन के दौरान श्री तिवारी ने श्री सत्यनारायण व्रत कथा को ही काव्यात्मक रूप में पिरो डाला।

श्रीकल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय निम्बाहेड़ा, चित्तौरगढ़ राजस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत मृत्युंजय के अनुसार जहाँ एक ओर कोरोना वैश्विक महामारी से बचाव हेतु विश्व के अनेक देशो कि भांति भारत में भी लाक डाउन चल रहा है। इस लॉक डाउन जैसे भयावह समय को व्यतीत करने के लिए लोग सोशल मीडिया का सहारा लेकर समय गुजार रहे हैं। वहीँ हमारा युवा वर्ग साडी चैलेन्ज और धोती, गमछा आदि चैलेन्ज को पूरा करने में लगा है। इन कार्यो से मेरा कोई व्यक्तिगत विरोध नही है। शास्त्रों में कहा गया है काव्य शास्त्र आदि के पढने लिखने से समय का सदुपयोग बुद्धिजीवी वर्ग करते है शेष लोग निद्रा में, व्यसन में, अथवा परस्पर वाद-विवाद में समय गुजारते है।

मृत्यंजय कहते हैं कि श्री सत्यनारायण स्वामी जी कि कथा जो स्कन्द पुराण के रेवाखंड से लिया गया है, लगभग हर सनातनी इस कथा के विषय में जानता और समझता है। चूँकि संस्कृत भाषा हर वर्ग को आसानी से समझ में नहीं आती। इसीलिए यह सर्व साधारण से दूर रही। बचपन से ही ऐसी जिज्ञासा रही कि भगवान सत्यनारायण जी कि कथा को सभी तक पहुचाने का कार्य अवश्य करूँगा और यह मौका कोरोना ने प्रदान किया।

मूलतः देवरिया जनपद के सलेमपुर विकास खंड के मिश्रौली ग्राम के निवासी मृत्युंजय बताते हैं कि इस तरह लॉक डाउन कि स्थिति में अपने निवास से ही विश्वविद्यालय के छात्रो को ऑनलाइन पाठन करवाने के बाद जो समय शेष बचता था उसका सदुपयोग करके उन्होंने इस कथा का काव्यात्मक रूप राधेश्याम धुन पर लेखन कार्य में लगा रहा, जो पूर्ण हो गया है। मृत्युंजय बताते हैं कि शीघ्र ही यह पुस्तक लोगों के हाथो में सादर समर्पित किया जायेगा।

पुस्तक से कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है, प्रसंग द्वितीय अध्याय से है –
तत्समय एक लकड़ी वाला, ले भार वहां पर आया है । ब्राह्मण को पूजन रत पाकर, श्रद्धा से मन भर आया है ।।
वह काष्ठ भार बाहर रखकर, प्यासा जन ब्राह्मण गेह गया। करके प्रणाम ब्राह्मण जन को व्रत से सम्बंधित प्रश्न किया।।
हे विप्रराज क्या करते हैं, इसके करने का फल क्या है । हे प्रभो कृपा कर बतलावें इस पूजन की महिमा क्या है ।।
ब्राह्मण ने समझाया भाई, यह सत्यनारायण का व्रत है। सब मनोकामना पूरण कर सुख वैभव दायक यह व्रत है ।।
व्रत के प्रभाव से ही मैंने, धन धन्य सकल यह पाया है। व्रत पूजन की महिमा सुनकर जन ने प्रसाद तब पाया है ।।
स्कन्द पुराण रेवाखंडे इति कथा अध्याय द्वितीय की है। सब श्रोतागण मिलकर बोलो श्री सत्यनारायण जी की जै।।

बता दें कि मृत्युंजय ने MS University Vadodara से आचार्य परीक्षा सन 2011 में विश्विद्यालय स्तर पर 3 Gold Medals प्राप्त किया है । महर्षि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय से ज्योतिष शास्त्र में Ph.D किया है। इसके अतिरिक्त राज्य एवं देश स्तर पर अनेक सम्मान एवं उपाधियाँ प्राप्त कर चुके है इनकी लिखी पुस्तके अनेक विश्वविद्यालयो के पाठ्यक्रम में समाहित है, अनेक शोधपत्रो का पठन देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत कर चुके हैं तथा 4 वर्षों का अनुभव महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय में पाठन का है।

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